पिठोरी अमावस्या कब है?
📅 22 अगस्त 2025, शुक्रवार
हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। प्रत्येक माह अमावस्या आती है और हर अमावस्या का अलग नाम व महत्व होता है। भाद्रपद की अमावस्या विशेष रूप से पितरों की शांति और संतान की मंगलकामना के लिए मनाई जाती है।
✨ पिठोरी अमावस्या का महत्व
- इसे कुश अमावस्या भी कहते हैं क्योंकि इस दिन कुश (दर्भा घास) का विशेष प्रयोग होता है।
- इस दिन पितरों के तर्पण और श्राद्ध से पितृ दोष का निवारण होता है और उनका आशीर्वाद मिलता है।
- जो माताएं यह व्रत करती हैं, उन्हें संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- 64 देवियों की पूजा का महत्व है, जिसके लिए महिलाएं आटे से मूर्तियाँ बनाती हैं और उनकी आराधना करती हैं।
- मान्यता है कि यह व्रत मुख्यतः सुहागिन महिलाएं करती हैं।
64 देवियों के नाम हैं ?
🕉️ पिठोरी अमावस्या की पूजा विधि
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और स्नान के जल में गंगाजल मिलाएँ।
- घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- पितरों के लिए तर्पण और दान करें।
- भगवान विष्णु और भगवान शिव की विशेष पूजा करें।
- महिलाएं मां दुर्गा और 64 देवियों की उपासना करती हैं।
- व्रत और पूजा के पश्चात दान-पुण्य करना विशेष फलदायी माना गया है।
🌸 पोला महोत्सव और पिठोरी अमावस्या
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में पिठोरी अमावस्या के दिन पोला महोत्सव भी मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से किसानों का है, जिसमें बैलों का पूजन होता है।
पोला महोत्सव की विशेषताएँ
- बैलों को नहलाया जाता है, सजाया जाता है और उनके सींग रंगे जाते हैं।
- बैलों को नई रस्सियाँ, लगाम और सजावट की सामग्री पहनाई जाती है।
- बैलों की शोभायात्रा (जुलूस) निकाली जाती है।
- घर लौटने पर बैलों की पूजा और आरती होती है।
- दीप जलाकर बैलों का स्वागत किया जाता है।
👉 दक्षिण भारत में इसे मट्टू पोंगल, उत्तर भारत में गोधन पूजा और तेलंगाना में इरुवाका पूर्णिमा कहा जाता है।
📅 पिठोरी अमावस्या की तिथियाँ
- 2025 – 22 अगस्त (शुक्रवार)
- 2026 – 10 सितम्बर
- 2027 – 31 अगस्त
- 2028 – 19 अगस्त
निष्कर्ष
यह अमावस्या केवल पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह माताओं का संतान-कल्याण व्रत भी है। इस दिन का व्रत और पूजा करने से पितृ दोष से मुक्ति, संतान की रक्षा और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही, पोला महोत्सव कृषि और पशुपालन की परंपरा को सशक्त बनाता है।
